यूजर:DrAmrendra123
[4/3, 4:06 pm] dramrendra ang: फागुन
------------ डॉ. अमरेन्द्र
पिया, फागुन के जोर
बोहे रँ बहलोॅ छै पटवासी- मोर
पिया फागुन के जोर ।
साँपे रँ ससरै छै देहोॅ पर पछिया
घटपट मन-देह करै, गोड़ोॅ के बिछिया
वैदा निरगुनियाँ केॅ हाँक पारै लोर,
पिया, फागुन के जोर !
लह- लह लहकै परासोॅ के जंगल
महुआ के फूलोॅ मेॅ भिडलोॅ छै दंगल
कुहकै छै कोयल करि छाती कठोर,
पिया, फागुन के जोर !
जे रँ उधियैलोॅ छै मंजर के इत्तर
गमकै छै मालती पर मालती के लत्तर
महुए सन महकै मन ई भोरम भोर,
पिया, फागुन के जोर !
बीये रँ गाछी मे फूलोॅ के ढेरी
हाँसै छै सब्भे टा ठारो केॅ घेरी
धूनी रमावोॅ तोंय ; छी-छी अघोर !
पिया, फागुन के जोर !
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संपादक : आँगी
अध्यक्ष :अंगिका भाषा फाउण्डेशन
सराय, लाल खाँ दरगाह लेन, भागलपुर ८१२००२
मो, न, ८३४०६५०६७९
[4/3, 4:26 pm] dramrendra ang: फागुन
------------ डॉ. अमरेन्द्र
पार करी केॅ ढेर महीना ई फागुन जे ऐलोॅ छै
मौसम के तेॅ बात अलग छै, मोॅन बड़ी फगुऐलोॅ छै ।
रोइयाँ-रोइयाँ बनी पलाशे मन के लाल करी देलकै
लहू हटाय केॅ नस-नस मेॅ टेसू के रंग भरी देलकै
साँसो मेॅ छै गंध अबीर के की रं मोॅन मतैलोॅ छै
मौसम के तेॅ बात अलग छै, मोॅन बड़ी फगुएलोॅ छै । -
कुहू- कुहू कोयल-कंठोॅ के पसरेॅ लगलै अनचोके
अंग-अंग के टूसा- टूसा फुदकी- फुदकी केॅ टोकै
ई देखी केॅ देह गाछ रं महुआ के महुऐलोॅ छै
मौसम के तेॅ बात अलग छै, मोॅन बड़ी फगुऐलोॅ छै ।
आमोॅ के ठारी-ठारी पर मंजर के मोती फरलै
मोॅद-गंध धरती अँचरा पर बिना गारले ही गरलै
गौनयैती कनियैनी रँ ही रितुओ अजब अघैलोॅ छै
मौसम के तेॅ बात अलग छै, मोॅन बड़ी फगुएलोॅ छै ।
रोकी राखोॅ ई फागुन केॅ जेठ नै अबकी आवैॅ दौ
जों आवी केॅ चल्लो जाय छै, तेॅ अखार केॅ जावै दौ
जोरने-जारन के की सोचौं, इखनी मोॅन सोन्हैलोॅ छै
मौसम के तेॅ बात अलग छै, मोॅन बड़ी फगुएलोॅ छै ।
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