दिखावा के हवा
आयज काल के नपका जमाना मऽ एगो अलगे हावा बही रहलो छै , जेकरा देखो सभ्भे कऽ देखा सिखी मऽ अपनो आप के वास्तविक पहचान कऽ भूली बिसरी करी के ओकरै रंग बनै रो नशा चढ़लो जाय छै जेकरा कि सोशल मीडिया पर तन टा पहचान मिली गेलो छै । आबऽ यहां धियान दै बला बात है छिकै कि 'लोगो रो बीचो म पहचान मिलना बहुत बढ़ियां बात छै ' मतुर कि हौ पहचान पाबै के माध्यम कि छेकै? , हम्मऽ कहिनो प्रस्तुति दै करि कऽ लोगो रो बीचो म प्रसिद्धि पाबै के कोशिश करि रहलो छियै?, कहिं हौ हमरो सभ्यता आरु संस्कृति के विकास के जग्हो प विनाश के ओर त नाय लै जाय रहलो छै? कहिने कि आयज कालो के लोग कला रो नामो पर अहिनो अभद्र आरू असभ्य चिजो क लोगो रो बीचो में परोसी रहलो छै जेकरा देखी क लाजो स देहो रो रोइयां सिहरी जाय छै आरू युवा म संस्कार रो अहिनो पतन देखी क तरवा रो लहर माथो प चढ़ी जाय छै।तभियो लोग वहऽ सिनी पीछु बौरैलो छै ।आबऽ एकरा सोशल मीडिया रो वरदान कहलो जाय कि अभिशाप?? एकरो असर कहीं न कहीं हौ भाषा के छवि पर भी बहुत नकारात्मक रुपो स पड़ै छै कहिनऽ कि हौ विडियो दुनिया के अलग अलग कोना तक पहुंचै छै, तऽ देखै बला के नजरिया हौ भाषा लेली औहने होलो जाय छै ।त हम्मऽ सभ्भै स अ खास तौर प युवा भाय बहिनी स है अनुरोध करै छियै कि एकरा प विचार करो, अच्छा काम करी क आगू बढ़ो लेकिन अपनो पहचान बनाबै के चक्करो म अपनो भाषा, सभ्यता आ संस्कृति के छवि क धूमिल करै के कोशिश गलतियो स नाय करो कहिने कि जननी आरू जन्मभूमि स बढ़ी क आरु कुच्छु नाय होय छै तऽ एकरो मान सम्मान बनैलऽ रखना आरु बढैले जाना हमरा सब लेली सर्वोपरी छै।।