अंगिका के प्रथम कवि सरहपा
सरहपा केॅ अंगिका केॅ आदि कवि केॅ रूपोॅ मेॅ जानलोॅ जाय छै। हिनका अंगिका केॅ वील्मीकी भी कहलोॅ जय सकै छै। सरहपा ही सिद्ध अंगिका केॅ आदि कवि छै जेॅ नऽ समाज केॅ आदर्श संरचना लगी मर्यादा पुरुषोत्तम राम केॅ चरित्र चित्रण करनेॅ छलै। सरहपा मेॅ भेद-भाव ,स्पर्श्य , उच्च-भिन्न केॅ भ्रान्ति केॅ धरना पऽ आधारित वर्णवादी ,जातिवादी ,अर्थवादी ,ब्राह्मणवादी समाज केॅ व्यवस्था अरु तज्जन्य अचार-व्यवहार मान अरु मूल्य केॅ विरोध करलकै। अरु मूल मानव केॅ प्रत्यय केॅ समर्थन करलकै। प्रकृति प्रदत्त प्रवृत्ति सिनी वृत्ति सिनी केॅ ऊर्ध्वीकरण केॅ एकटा अभूतपूर्व उपाय बतलैलकै। प्राकृतिक मूल्यवार केॅ उच्चाभिमुख रूपांतरण सिखलैलकै अरु अध्यात्मवाद अरु रहस्यवाद केॅ सामजिकीकरण करलकै। सिद्ध सरहपा केॅ कविता ,कविता छै ,कोय संपद्यति नै। मनुष्यों केॅ चेतना सतही ऊपरी चाल मेॅ बिखेरै छै। एक बिंदु सऽ दोसरो बिंदु पऽ एक चिंता सऽ दोसरो चिंता पऽ एक दृश्य सऽ दोसरो दृश्य पऽ ,एक बिम्ब सऽ दोसरो बिम्ब पऽ ऊ चक्कर लगैंते रहे छै। एकरा कोय लक्ष्य ,कोय ध्येय ,आराध्य अरु आलम्बन पऽ एकाग्र करै लगी सरहपा केॅ पहिने जेॅ साधना मार्ग प्रचलित छलै ,ऊ दक्षिण मार्गी छलै मतलब की ऊ लोगें केॅ प्राकृतिक प्रवृती सिनी केॅ दमन केॅ उपदेश दै छलै। ब्राह्मण परम्परा केॅ सन्यासी सिनी, योगी सिनी अरु आगम परम्परा के हीनयानी बौद्ध अरु जैन योगी सिनी नऽ भी मुक्ति केॅ उपाय केॅ रूपों मऽ मनुष्य तत्त्व अरु प्रवृती सिनी केॅ विनाश अरु दमन केॅ मार्ग ही अपनैने छलै।
महायोगी सिद्ध सरहपा नऽ मनुष्य केॅ मन केॅ संरक्षण अरु समाजिक स्तर पऽ भेद-भाव केॅ निराकरण लगी वामऽ मार्गी साधना केॅ अविष्कार करलकै अरु ऊ ई निष्कर्ष पऽ पहुँचलै की सब्भेॅ दार्शनिक अरु साधक कोय-न-कोय दृष्टि केॅ शिकार रहै ,कहनेॅ की सब्भे दार्शनिक एक्केॅ दृष्टि केॅ ही प्रस्ताव करै छै।
असंग ,वसुबन्ध अरु नागार्जुन नऽ सरह सऽ पहिने ई दृष्टिवाद केॅ खंडन करनेॅ छलै ,केहनेॅ की दृष्टिवाद अविनाभावेन संकीर्णता केॅ जनक होय छै अरु ऊ मानवऽ चेतना केॅ मुक्तता अरु सब्भे अतिक्रमणकारी शक्ति केॅ परिसीमित करि दै छै अरु यही की वेदांत सांख्य न्याय वैशेषिक ,योग ,हीनयानी ,बुद्धमता ,जैन दर्शन ई सबटा मानव मन केॅ दमन करि केॅ आध्यात्मिक चेतना केॅ उपलब्ध कराय लगी चाहै छलै। ठीक एकरोॅ उनटोॅ सरहपा नऽ नागार्जुन केॅ शून्यवाद अरु असंग वसुबन्ध केॅ विज्ञानवाद के आधार प वज्रयान सहजयान के बिकसित करि केॅ दृष्टि केॅ स्थान पऽ दर्शनाऱतत चैतन्य केॅ मुक्तावस्था अरु सर्वातितता घोषित करलकै अरु ई चरम दशा अरु निर्वाण केॅ प्राप्ति लगी प्रकृति प्रदत्त प्रवृत्ति सिनी अरु संकल्प विकल्प सेॅ संपन्न मानव मन केॅ साधना केॅ माध्यम बनैलकै अरु कहलकै की प्रकृति केॅ अनुकूल ही चली केॅ मुक्ति अरु निर्वाण संपन्न होय छै। स्पष्ट छै की ई दक्षिणमार्गी विचारधारा सिनी केॅ विपरीत उनटोॅ चलाई केॅ मार्ग छलै ,यही कारण छै की वाममार्गी कहलैलै अरु ई मार्ग मेॅ काम, क्रोध,भय ,शोक आदि केॅ स्थिति मऽ मन पत्थल बनाय केॅ विचरण कराइ केॅ प्रक्रिया स्वीकार करलोॅ गेलै छै। जाहिर छै की ई खतरनाक क्षेत्रो मेॅ प्रवेश छै जेकरा मेॅ साधक केॅ पतन या मृत्यु केॅ भय रहे छै मतरकी तब्भे तऽ ई वीर साधना कहलाय छै। वैष्णव साधना लगी तऽ भजन कीर्तन होतैं छै ,क्रिया नैय जबकि वाममार्गी योग क्रिया योग छै।
सरहपाद नऽ ई वाममार्गी साधना केॅ अनुभवो केॅ सांध्यभाषा केॅ झिलमिल प्रयोग सिनी केॅ द्वारा एकटा हरदम्मेॅ नयोॅ अरु विचित्र रचना संसार मेॅ रचनेॅ छै जेकरा सुकुमारमति अरु रूढ़िवादी नैतिकता केॅ पक्षधर ,सतही पांडित्य अरु वैष्णव बुद्धि केॅ आलोचक पचाय नैय सकै अरु रहलै बात मूल्यांकन के तऽ ऊ कब्भो नैय हुवै पारै।
सिद्ध सरहपा साधना दर्शन अरु कविता केॅ गुत्थी केॅ सुलझाय लगी हम्मेॅ ई ग्रन्थ अरु ग्रन्थकार सिनी केॅ मनों सेॅ टोकड़ी भड़ी भड़ी आभार व्यक्त करै छियै।
बार-बार पठन-पाठन ,मनन अरु विचार सं ई एकटा छोटोॅ किताब मऽ सरहपा केॅ जेॅ प्रस्तुति यहाँ होलो छै ,ऊ हमरा प्रामाणिक लागै छै अरु हम्मेॅ समझै छियै की अंगिका केॅ पहिलो कवी सिद्ध सरहपा केॅ बोली केॅ अबे सही परिप्रेक्ष्य मेॅ समझलो जाय सकतै।
सतही सामाजिकता केॅ आवेश मऽ भारतीय (अंगिका ) रहस्यवाद केॅ कविता केॅ क्षेत्र मेॅ नकारलो गेलै अरु फेनु रहस्यवादी कविता जेॅ खली कवितै नैय मानलोॅ गेलै ,कविता केॅ क्षेत्र खली सामान्य भावना सिनी तक ही सिमित छै। कविता मऽ भारतीय रहस्यवादी केॅ परम्परा केॅ जय शंकर प्रसाद समझैणे रहै।
सरहपा केॅ वाणी केॅ राष्ट्र नैतिकता केॅ दृष्टि सेॅ नैय मानवीयता केॅ दृष्टि सेॅ भी समझलोॅ जाय सकै छै।
तब्भे कहलोॅ जाय छै
सरह केॅ वाणी अमर होय गेलै।
दूध सेॅ उत्तम सुख मेॅ नहैले।।